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हिमाचल प्रदेश में त्रिशंकु विधानसभा के आसार

सरकार बनाते-बनाते तारे दिखाई देंगे इस बार

शिमला : हिमाचल में चार नवंबर को होने जा रहे विधानसभा चुनावों के लिए चुनाव प्रचार तेज होने लगा है। लोगों का मूड़ देखकर लगता है कि इस बार चुनावों में पूर्ण बहुमत किसी भी पार्टी के पक्ष में नहीं रहेगा। प्रदेश में त्रिशंकु विधानसभा बनने के आसार अधिक नजर आ रहे हैं। दोनों पार्टियां 25 से 30 सीटें जीतने के इर्दगिर्द घूमती नजर आ रही हैं। संतुलन आजाद प्रत्याशियों के हाथ में आ सकता है।

केन्द्र की कांग्रेस सरकार में दिन प्रतिदिन उजागर हो रहे घोटाले जहां प्रदेश में कांग्रेस के लिए आफत बने हुए हैं वहीं प्रदेश में पिछले पांच सालों में सरकार की भ्रष्ट कारगुजारी भाजपा के लिए सिरदर्द बनी हुई है। लोगों का दोनों राजनैतिक पार्टियों से मोहभंग होने से यह बात स्पष्ट रूप से नहीं कहीं जा रही है कि प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा बहुमत का आंकड़ा छूने में सफल हो जाएंगी या नहीं…।

शिमला संसदीय सीट पर पिछले विधानसभा में चुनावों में भाजपा को जिस प्रकार हैरतअंगेज सफलता मिली थी वह अब धूमिल पड़ती नजर आ रही है। पिछले चुनावों में भाजपा को सोलन की पांचों विधानसभा सीटों पर जीत मिली थी लेकिन इस बार वह मुश्किल से दो से तीन सीटें जीतने के करीब ही पहुंच सकती है। यही हाल यहां पर कांग्रेस का भी है। जिला में इस बार निर्दलीय प्रत्याशी भी चुनाव मैदान में उतरे हैं और दो सीटों पर उनकी जीत की संभावनाएं भी प्रबल महसूस की जा रही हैं।

शिमला जिला में भाजपा को इस बार एक दो सीटों पर जीत नसीब हो जाए तो गनीमत होगी। यहां से कांग्रेस अपनी स्थिति को सुधारने की ओर अग्रसर हो रही है। जबकि यहां भी आजाद प्रत्याशी एक दो सीटें झटक सकते हैं। सिरमौर में कांग्रेस अच्छी स्थिति में आ सकती है। यहां से नाहन सीट पर भी आजाद प्रत्याशी की जीत की संभावना बनती हुई नजर आ रही है। भाजपा यहां से एक सीट भी अपनी झोली में डाल दे तो यह उसकी उपब्धि कही जा सकती है।

कुल मिलाकर मंडी, कांगड़ा और हमीरपुर संसदीय क्षेत्रों में परिणामों में कोई बड़ा फर्क नहीं आने वाला है। प्रदेश में नवगठित हिलोमा यहां पर भाजपा को कुछ नुक्सान करेगा और उसकी सरकार बनाने की संभावना को क्षिण करेगा। शिमला संसदीय क्षेत्र में भाजपा को नुक्सान होने के कारण इस बार वह पूर्ण बहुमत प्राप्त करने तक नहीं पहुंच पाएगी। प्रदेश में करीब 12-15 सीटों पर कांग्रेस और भाजपा को आजाद प्रत्याशियों (जिसमें हिलोमा भी शामिल है) से दो चार होना पड़ेगा। आजाद प्रत्याशियों की संख्या बढ़ती है तो सरकार बनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी।

बहुत से राजनैतिक पंडितों का मानना है कि यदि हिमाचल में पं. सुखराम द्वारा गठित हिमाचल विकास कांग्रेस अस्तित्व में होती तो वह इस समय सरकार बनाने के काबिल हो गई होती। हलांकि कुल्ल के महेश्वर सिंह ने उसी तर्ज पर हिलोपा का गठन किया है लेकिन इसमें कांग्रेसजनों के शामिल न हो पाने के कारण यह उतना बड़ा स्वरूप नहीं ले पाई है जितना हिविकां का जनाधार बन गया था। यदि हिलोमा प्रदेश में तीन चार और तीन चार आजाद प्रत्याशी चुनाव जीतकर आ गए तो यह लोग कांग्रेस और भाजपा की आसानी से सरकार बनाने की राह में अड़चन बन जाएंगे। सरकार कांग्रेस की बने या भाजपा की आजाद प्रत्याशियों को मंत्री बनाकर ही सरकार को अपने आपको टिकाए रखना होगा।

इसी बात के चलते प्रदेश में आजाद प्रत्याशियों के जीत की संभावनाएं भी अधिक हो गई हैं। कांग्रेस और भाजपा के विधायकों में कौन मंत्री बनेगा यह बात चुनावों से पूर्व तय नहीं हो पा रही है। लेकिन जो भी आजाद प्रत्याशी चुनाव जीतने की स्थिति पर पहुंच रहा है उसके मंत्री बनने की संभवनाएं प्रबल होती जा रही है। प्रदेश के लोगों को जहां भी आजाद प्रत्याशी का विकल्प दिख रहा है वह उसकी ओर गौर जरूर कर रहे हैं और जहां आजाद प्रत्याशी थोड़ा सा भी दबंग दिख रहा है लोग उसकी जीत के लिए पार्टी प्रत्याशी से अधिक आश्वस्त होते जा रहे हैं। देखना यह है कि देश भार में चल रहे घटना चक्र का लाभ प्रदेश के कितने आजाद प्रत्याशी उठा पाते हैं।

Virbhadra Singh, Prem Kumar Dhumal, Congress, BJP, Himachal Pradesh, third front

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