अन्ना ने केजरीवाल से किया किनारा ,फोटो के इस्तेमाल पर भी एतराज

नई दिल्ली : खुद महात्मा गांधी का फोटो लगाकर आंदोलन करने वाले अन्ना हजारे ने राजनीति करने के लिए अरविंद केजरीवाल को अपना फोटो लगाने से इंकार कर दिया। उन्होंने बिना अन्ना के सफल आंदोलन भी कर डाला। इससे यह बात उजागर हो गई है कि दोनों के बीच की दूरियां अब बढ़ चुकी हैं। लोगों ने दोनों के अलग अलग तरीके से चलने के फैसलों पर विवेचना शुरू कर दी है।
अन्ना हजारे ने पिछले दिनों साफ शब्दों में कह दिया है कि यदि केजरीवाल पार्टी बनाना चाहे हैं तो वह उनकी न तो फोटो लगाएंगे और न ही कहीं उनका नाम लेंगे। केजरीवाल के फैसले को कुछ लोग पंडित नेहरू के लाहौर अधिवेशण में लिए गए फैसले से जोड़कर देख रहे हैं जहां पंडित नेहरू ने अपने पिता मोती लाल नेहरू के खिलाफ जाकर यह घोषणा कर डाली थी कि कांग्रेस अब आजादी के अलावा अंग्रेजों से और कोई मांग नहीं करेगी। इससे पहले कांग्रेस की लड़ाई अंग्रेजों से भारत के गुलामों को ब्रिटेन के नागरिक जैसा नागरिक बनाने की चल रही थी। पं. नेहरू के इस फैसले के बाद ही कांग्रेस ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने जैसे आंदोलनों में तेजी लाई थी।

बहुत से लोग केजरीवाल के चुनाव लड़ने के फैसले को इसलिए भी सही मानते हैं कि अब भारत वर्ष गुलाम नहीं है। लोकतंत्र में भारत की जनता संसद और विधानसभा में सदस्यों का चयन करती है। ऐसे में यदि असंतुष्ट सदस्यों को इन सदन से बाहर करने के लिए राजनैतिक पार्टी का गठन कर लिया जाए तो इससे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने में आसानी होगी। अच्छे लोगों को संसद और विधानसभाओं में जाने का एक नया मंच मिलेगा। पार्टी का लक्ष्य भ्रष्टाचार के खिलाफ होगा। इस पार्टी को देखकर अन्य राजनैतिक दल भी अपनी पार्टियों में सुधार करने की बात करने लगेंगे। ऐसा माहौल देने से देश में अच्छे राजनैतिक माहौल का सूत्रपात होगा।
दूसरी ओर अन्ना हजारे के समर्थकों का मानना है कि इससे राजनैतिक भ्रष्टाचार उनकी राजनैतिक पार्टी में भी घुस जाएगा। ऐसे लोगों का मानना है कि वह राजनीति से दूर रहते हुए जनजागरण अभियान चलाकर देश के लोगों को जगरूक करते रहेंगे। साथ ही मौजूदा सरकारों को जनहित में कार्य करने के लिए दबाव बनाने का काम भी करेंगे।
अन्ना हजारे का समर्थन करने वाले लोग इस बात का जवाब नहीं दे पा रहे हैं कि संसद और विधानसभाओं में राजनैतिक स्वच्छता लाने के लिए लोग किसे वोट देंगे। जब लोगों को कांग्रेस, भाजपा और अन्य पार्टियों को ही वोट देने की मजबूरी होगी तो इस प्रकार के आंदोलनों का कोई ठोस परिणाम नहीं निकल पाएगा। इससे बेहतर है कि भारत के संविधान की ताकत पर संसद में बैठे दागी लोगों को चुनावों में हरवाकर ही देश में भ्रष्टाचार समाप्त करने के मार्ग प्रशस्त किए जाएं। माना इसमें उनकी नई राजनैतिक पार्टियों कोई बड़ी सफलता नहीं मिलती है, लेकिन इससे राजनैतिक सुधार की प्रक्रिया तो देश में शुरू हो जाएगी। जब बहुमत में मतदाता भ्रष्ट लोगों को बाहर का रास्ता दिखाने का फैसला करेंगे तो आज दिया गया विकल्प अपने वाली नस्लों को सही दिशा की ओर ले जाने के काम में आएगा। पं. नेहरू भी जानते थे कि देश के लोग आजादी के काबिल नहीं हैं फिर भी उन्होंने आजादी की मांग पुर्जोर तरीके से उठाई और हम आजादी के दिन तक पहुंच गए। यह अलग बात है कि देश को सुधारने के कार्यक्रम आजादी पाने के जैसे जुनून की तरह जारी नहीं रह सके। अब इसकी मांग देश के सामने है।

Tags: Anna Hazare , Arvind Kejriwal

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