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क्या साल 2014 के चुनावों में हार का सामना करेगी कांग्रेस ?

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नई दिल्ली: केन्द्र में डा. मनमोहन सिंह की सरकार क्या 2014 के चुनावों में भारत के लोगों के हाथों से बच पाएगी। यह प्रश्न अभी करीब ढेड़ वर्ष पहले ही लोगों के दिमागों में कौंधने लगा है। कहते हैं जब कोई सरकार अपनी विश्वसनीयता खो जाए तो उसके अच्छे काम भी बुरे लगने लगते हैं।
यूपीए-2 में जो घोटाले सामने आए हैं उसने सरकार की साख पर बट्‌टा लगा दिया है। वैसे तो घोटाले सामने आना कोई बुरी परंपरा नहीं है। लेकिन उसमें मंत्रियों का नाम पाए जाने के बावजूद उनके पदों पर बने रहना स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा नहीं कही जा सकती है। आरोप लगने मात्र पर ही आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही हो जाने को स्वस्थ लांकतांत्रिक परंपरा कहा जा सकता है। लोगों को इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए कि सरकार बदलने के बाद देश में घोटाले नहीं होंगे। देखना यह है कि सरकार घोटालेबाजों का साथ देती हुई महसूस होती है या उनके खिलाफ। डा. मनमोहन की सरकार हो या देश की अन्य प्रांतीय सरकारें हों जिसमें अदालत के फैसले के बाद आरोपी मंत्री के खिलाफ कार्यवाही होती है तो लोगों का सरकार पर से यह विश्वास डगमगा जाता है कि सरकार ने अदालत के फैसले से पहले मंत्री के खिलाफ कार्यवाही क्यों नहीं की।

फिलहाल अभी केन्द्र में डा. मनमोहन सरकार त्रिणमूल कांग्रेस की समर्थन वापसी के फैसले से डगमगाने लगी थी। बात चली तो कहा गया सरकार को मुलायम बचा लेंगे। नहीं तो नितीश सरकार के संकट मोचक बनकर सामने आ सकते हैं। सरकार मौजूदा हालात में बचेगी या जाएगी इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है। फर्क पड़ता है तो इस बात से कि डा. मनमोहन सरकार भारत की आम जनता से आम चुनावों में बच पाएगी या नहीं। जिस प्रकार से सरकार ने अपनी आर्थिक नीतियों से लोगों को राहत प्रदान करने में अपनी लाचारी दिखाई है उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि सन्‌ 2014 के चुनावों में डा. मनमोहन सरकार का बचना मुश्किल है।

लोगों ने पिछले पांच सालों में सिर्फ भारत सरकार को ही पालने का काम किया है। जबकि संविधान के अनुसार लोगों को पालने का काम सरकार को करना चाहिए था। लोग दाने दाने को मोहताज होते रहे और सरकार के घोटाले दनादन उजागर होते रहे। सरकार ने आरोपियों को प्रताड़ना लगाने के स्थान पर उनकी पीठ थपथपाने का काम किया। सरकार के आम नागरिक से किए गए इस व्यवहार से एक बार फिर भारत के लोगों को डा. मनमोहन सरकार ने गुलामी के दिनों की याद ताजा करवा दी। लोगों को यह महसूस होने लगा था कि वह सरकार के रहम पर जिंदा हैं। जबकि सरकार लोगों के रहमोकर्म पर जिंदा रही यह बात सरकार में बैठे लोग भूल गए थे। चुनावों के समय में राहत के टुकड़े फैंकने से यह बात और पुख्‍ता हो चली है कि लोगों को थोड़ी सी राहत दे दी जाए ताकि वह चुनावी वर्ष में इस एहसाहस से बाहर आ जाएं कि उनके साथ सरकार ने पिछले साढ़े चार सालों में गुलामों जैसा व्यवहार किया है।

क्या सरकार भारत के लोगों के पिछले पांच साल वापस लौटा सकती है जब देश की जनता महंगाई की मार से संभलती थी और सरकार की मार फिर उन पर पड़ जाती थी। ऐसा एक नहीं अनेक बार हुआ है। अब ऐसी सरकार पर लोग फिर से विश्वास करेंगे इस बात पर जरा संदेह है। अब तो आंकलन इस बात पर शुरू हो चुका है कि क्या कांग्रेस 2019 में भी वापसी कर पाएगी या उत्तर प्रदेश की तरह उसे केन्द्र में आने के लिए दशकों तक इंतजार करना पड़ेगा।

Tags: Manmohan Singh, Sonia Gandhi, Congress

 

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