धूमल-वीरभद्र की आसान नही डगर, निर्दलियों के हाथ होगी चाबी !

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शिमला : हिमाचल प्रदेश में दोनों प्रमुख पार्टियों के मुख्य नेताओं के मुख्यमंत्री बनने की राह आसान नहीं है। दोनों पार्टियों में से जिस पार्टी को पूर्णबहुमत नहीं मिल पाएगा उसके मुख्यमंत्री बनाने की राह और टेढ़ी हो जाएगी।

माना जा रहा है कि यदि प्रदेश की जनता ने बहुमत कांग्रेस पार्टी को दिया तो मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ही होंगे और यदि बहुमत भाजपा की ओर गया तो मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ही होंगे। यदि बहुमत के आंकड़ें को कांग्रेस और भाजपा दोनों ही न छू पाई तो क्या होगा इस बात पर अलग अलग कयास लगाए जा रहे हैं। पर इतना तय है कि प्रदेश का मुख्यमंत्री कौन होगा इस बात का फैसला वही करेंगे जिसके हाथ में जनता सत्ता की चाबी आम जनता थमाएगी।

इस बात की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि सत्ता का संतुलन कांग्रेस और भाजपा के हाथ में न रहकर तीसरे और आजाद प्रत्याशियों के हाथ में चला जाए। इन आजाद प्रत्याशियों को अगर तीसरे राजनैतिक दलों ने नेतृत्व प्रदान कर दिया तो यह बात उन पर निर्भर कर जाएगी कि कांग्रेस के वीरभद्र सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री बनेंगे या प्रेम कुमार धूमल। यह संभावना भी व्यक्त की जा रही है कि सत्ता का संतुलन प्राप्त करने के बाद ऐसे लोग इस बात की मांग पर अड़ जाएं कि श्री धूमल हिमाचल के मुख्यमंत्री नहीं होंगे। ऐसे में भाजपा को कोई नया विकल्प खोजने की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे लोग यह मांग भी कर सकते हैं कि कांग्रेस वीरभद्र सिंह के स्थान पर किसी और को मुख्यमंत्री बनाए। अब यह बात इस गणित पर निर्भर करती है कि किसी प्रकार के लोग या अन्य दलों के प्रत्याशी चुनाव जीतकर विधानसभा में पहुंचते हैं। यदि कुछ कांग्रेस और कुछ भाजपा के बागी चुनाव जीत जाते हैं तो वह मिलकर यह मांग भी कर सकते हैं कि कोई नया व्यक्ति हिमाचल का मुख्यमंत्री बने।

इस बात की जरूरत यहां इसलिए पड़ रही है क्योंकि प्रदेश में करीब 40 सीटें जीतने की स्थिति में कोई भी दल नजर नहीं आ रहा है। जबकि प्रदेश में सरकार बनाने के लिए 35 सीटें जीतने की जरूरत दोनों पार्टियों को है। पिछले चुनावों में भी यह देखा गया है कि सरकार बनाने और न बनाने वाले दल में करीब 10 सीटों का ही अंतर रहता है। इसलिए इस बात से पूरी तरह से इंकार नहीं किया जा सकता है कि सत्ता का संतुलन तीसरे के हाथ में नहीं जा सकता है।

चुनाव परिणाम के बाद यदि कांग्रेस और भाजपा में से किसी भी दल को 36 सीटें मिल गई तो इसे उसकी खुशकिस्मती ही कहा जाएगा। भाजपा प्रदेश की सत्ता में जरूर है लेकिन चुनावों से पहले उसमें विभाजन हो चुका है। यह विभाजन उसकी सीटों को 30 सीटों तक गिराने में भी सफल हो गया तो भाजपा के लिए बड़ा संकट हो सकता है। यदि इसका लाभ उठाते हुए अपनी 22 सीटों के पुराने आंकड़े से आगे बढ़ जाती है तो भी सत्ता का संतुलन तीसरे के हाथ में जाने की संभावना और प्रबल हो जाती है।

प्रदेश में इस गणित का प्रभाव सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पड़ता हुआ नजर आ रहा है। कुछ लोगों का मानना यह भी है कि भाजपा से नाराज हुए लोगों के हाथ में यदि सत्ता का संतुलन आ गया तो वह पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को समर्थन देकर कांग्रेस की सरकार प्रदेश में बनवा सकते हैं। लेकिन इससे पहले वह इस मांग को भी रख सकते हैं कि भाजपा अपना मुख्यमंत्री बदले तो वह भाजपा को अपना समर्थन दे सकते हैं। यदि भाजपा ने उनकी बात को मान लिया तो प्रदेश में भाजपा की सरकार बनाने की संभावना फिर से प्रबल हो सकती है।

हिमाचल प्रदेश में इससे पहले भी ऐसा राजनैतिक नाटक देखने को मिल चुका है। जब पं. सुखराम ने कांग्रेस की सरकार बनाने के लिए वीरभद्र को मुख्यमंत्री न बनाने की बात रख दी थी। कांग्रेस ने सुखराम की बात का नकार दिया था और धूमल पहली बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए थे। पर अब यह बात जरूरी नहीं है कि भाजपा भी ऐसा ही करे। इसका सबसे बड़ा कारण यह भी मना जा रहा है कि भाजपा अब किसी भी प्रांत में अपनी सरकार को खोने की स्थिति में नहीं है। यदि ऐसी परिस्थिति का निर्माण होता है तो भाजपा को धूमल के पैर पीछे खींचने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं होगा। धूमल को वह संसद चुनाव लड़वाकर अच्छे स्थान पर तो बिठा सकेगी पर हिमाचल में विपक्ष में जाकर वह एक प्रांत में सरकार जाने के सदमें को बरदाश्त करने के काबिल नहीं होगी। इसलिए हिमाचल चुनाव में कुछ भी संभव है।

Prem Kumar Dhumal , Virbhadra Singh, Himachal Pradesh, Vidhan Sabha

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