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मणिमहेश झील यात्रा : जानिए कैसे पूरी होती है यात्रा

मणिमहेश झील हिमाचल के प्रमुछ तीर्थ स्थलों में से एक है.

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Important News /जरूरी सूचना : कोरोना वायरस संकट के चलते साल 2020 की मणिमहेश यात्रा कुछ लोगों के साथ संपन्न होगी .प्रशासन यात्रियों के छोटे छोटे जथ्थे यात्रा के लिए रवाना कर रहा है। यात्रा के लिए प्रशासन की सहमति जरुरी है।

पवित्र मणिमहेश झीलमणिमहेश झील यात्रा हिमाचल के प्रमुछ धार्मिक आयोजनों में से एक है

यह झील भरमौर से 21 किलोमीटर दूर स्थित है।

सामान्य तौर पर ,इस पवित्र झील पर हर साल भाद्रपद के महीने में एक मेला  आयोजित किया जाता है जिसे स्थानीय भाषा में जातर कहते हैं.

मेले के दौरान आयोजित की जाने वाली यात्रा में प्रदेश और देश के लाखों तीर्थ यात्री हिस्सा लेते हैं।

सभी तीर्थ यात्री पवित्र जल में डुबकी लेने के लिए इकट्ठा होते हैं। यह मेला भगवन शिव को समर्पित होता है.

अगस्त में आयोजित होती है मणिमहेश की पवित्र झील तीर्थ यात्रा

मणिमहेश झील हिमाचल का एक प्रमुख तीर्थ स्थल है जो करीब 13500 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।

झील को भगवान् शिव के आराम की जगह माना जाता है और यात्रा को मणिमहेश यात्रा कहते हैं ।

यात्रा का आयोजन चम्बा जिला प्रशासन और सवयंसेवी संस्थाओं के सहयोग से किया जाता है।

आयोजन हर साल हिन्दू कैलेंडर के भादों मॉस या राधाष्टमी के दौरान आयोजित किया जाता है।

जन्माष्टमी से शुरू होने वाली यह पवित्र यात्रा 15 दिनों तक जारी रहती है।

मणिमहेश झील यात्रा चम्बा नगर के लक्ष्मी नारायण मंदिर और दशनामी अखाडा से शुरू होती है। यात्रा की समाप्ति में कुल छ दिन लगते हैं।

इस यात्रा का शुभारम्भ पवित्र छड़ी के साथ शुरू होता है। इस पवित्र छड़ी को श्रद्धालु और साधू अपने कन्धों पर उठा कर यात्रा शुरू करते हैं। झील पर पवित्र छड़ी पहुंचने पर रात भर पूजा की जाती है।

दुर्गम रस्ते से गुजरती है मणिमहेश यात्रा

मणिमहेश यात्रा तीन रास्तों से तय की जा सकती है।

लाहौल-स्पीति के रस्ते से तीर्थयात्री कुगति पास से गुजर कर मणिमहेश झील पहुँचते हैं ।

इस यात्रा की हैरान कर देने वाली बात यह है कि ,यात्रा नंगे पैरों से चल कर पूरी की जाती है . सड़क के आखिरी छोर हड़सर से यात्रा का कुल सफर 14 किलोमीटर लम्बा है।

इस यात्रा को पूरा करने में दो दिन का समय लगता है। धन्छो इस यात्रा का रात्रि पड़ाव है।

यात्रा का रास्ता दुर्गम है जो सदियों से तय मार्ग से ही गुजरता है। यात्रियों की सुविधा के लिए हड़सर तक परिवहन की सुविधा उपलब्ध करवाई जाती है।

भोजन के अलावा, दवाई और दूसरी सुविधाएं भी उपलब्ध करवाई जाती है। यहाँ ठहरने के लिए आप चम्बा या भरमौर से टेंट किराए पर ले सकते हैं।

जिन यात्रियों को पैदल चलने में दिक्कत है वह सवारी के लिए किराये पर खच्चर की सुविधा ले सकते हैं।

चम्बा से सीधे ट्रेकिंग करके भी पंहुचा जा सकता है मणिमहेश झील

आप चम्बा से सीधे ट्रैकिंग करके भी यात्रा कर सकते हैं।  चम्बा से मणि महेश पहुंचने में नौ दिन का समय लगता है।

इस मार्ग में चम्बा से बीस किलोमीटर राख ,भरमौर , हड़सर ,धन्छो और मणिमहेश नामक स्थान आते हैं।

ट्रैकर इस मार्ग पर भीरंम घाटी में विश्राम कर सकते हैं। वापसी के लिए भी इसी रस्ते चम्बा पहुंचना होता है

यात्रा का दूसरा रास्ता कांगड़ा और मंडी से कवारसी या जलसू पास से हो कर गुजरता है।

लेकिन तीसरा रास्ता सबसे आसान है। ये रास्ता चम्बा से शुरू हो कर भरमौर से गुजरता है । इस रस्ते पर हडसर तक बस सेवा उपलब्ध है ।

हडसर और मणिमहेश के बीच धन्चो नामक स्थान है जहाँ यात्री रात गुजारते हैं। । धन्छो में एक एक सुंदर झरना बहता है.

मणिमहेश झील से करीब एक किलोमीटर की दूरी पहले गौरी कुंड और शिव क्रोत्री नामक दो धार्मिक महत्व के जलाशय हैं.

एक मान्यता के मुताबिक गौरी और शिव ने कभी इस जगह पर स्नान किया था | मणिमहेश झील जाने से पहले महिला तीर्थयात्री गौरी कुंड में और पुरुष तीर्थयात्री शिव क्रोत्री में पवित्र स्नान करते हैं ।

मणिमहेश झील में सनान से संपन्न होती है यात्रा

पवित्र मणिमहेश झील एक बर्फीले मैदान के बीच में बनी है. झील चट्टानों से घिरी हुई है।

इसके आस पास कोई हरियाणा नहर नहीं आती। कुछ कंटीली झाड़ियां जरूर हैं. स्थानीय भाषा में इसे शिव चौगान कहा जाता है।

झील में सन्नाटा पसरा रहता है जो तभी टूटता है जब यात्री यहाँ आते हैं। कड़ाके की ठण्ड के कारण यहाँ पर कोई जन-जीवन नहीं है। कभी कभार इक्का -दुका पक्षी उड़ते हुए आते हैं।

किवदंती के मुताबिक भगवान शिव ने इस जगह पर सैंकड़ों साल तक तप किया। उनकी जटाओं से जो जल प्रवाह निकला उससे मणिमहेश झील का निर्माण हुआ। झील एक तश्तरी के आकर की है।

इस झील के दो हिस्से हैं। झील के बड़े हिस्से को शिव करोत्री कहा जाता है। इस हिस्से का पानी बेहद ठंडा है। मान्यता के मुताबिक भगवन शिव इस जगह पर स्नान करते थे।

झील के दूसरे हिस्से को गौरी कुंड कहा जाता है। यह आकर में छोटा है और झाड़ियों में छिपा है। इस हिस्से का पानी शिव करोत्री की तुलना में गुनगुना है। मान्यता के मुताबिक इस जगह पर माता गौरी  स्नान करती थीं।

इसे आस्था की पराकाष्ठा ही कहें की कड़ाके की ठण्ड के बावजूद भी शिवभक्त इस झील तक पहुंच कर इसके ब्रह्माणी कुंड के कंपकपा देने वाले पानी में स्नान करते हैं।

मणिमहेश की पवित्र यात्रा इस झील में स्नान करने से संपन्न होती है।

पवित्र जल में स्नान के बाद, तीर्थयात्री झील की परिधि के चारों ओर तीन बार चक्कर लगते हैं ।

मणिमहेश झील से दिखाई देता है मनमोहक नज़ारा

झील और उसके आस-पास एक शानदार दृश्य दिखाई देता है. आसमान छूते कैलाश पर्वत के दर्शन होते हैं जो भाबवान शिव का वास है।

झील में स्नान करने के बाद मणिमहेश झील यात्राशिव भक्त इस पर्वत को आस्था से देखते हैं और उनकी अराधना करते है।

रात के समय चांदनी जब कैलाश पर्वत की छोटी से टकराती है तो पर्वत किसी मणि की तरह चमकता है।

ये दृश्य दुर्लभ होता है। इसी कारण इस झील को मणिमहेश भी कहते हैं।

स्थानीय मान्यता के मुताबिक शिव भक्तों को केवल तभी कैलाश पर्वत के दर्शन होते हैं जब भगवन शिव प्रसंन्न हों।

खराब मौसम के कारण जब कैलाश पर्वत की छोटी बादलों के पीछे छिप जाती है तो समझा जाता है भगवन खुश नहीं हैं।

कैलाश पर्वत को लेकर प्रचलित है कई लोकथाएँ

मणिमहेश झील की पूर्व दिशा में कैलाश पर्वत स्थित है। यह पर्वत समुद्रतल से करीब 18564 फीट ऊंचा है और लोगों की इस पर्वत में गहरी आस्था है।

कैलाश पर्वत को अजेय माना जाता है यानि कोई आज तक इस पर्वत पर नहीं चढ़ पाया । कोई भी अब तक इस चोटी को माप करने में सक्षम नहीं हुआ है.

माना जाता है की कोई भी शिव भक्त और पर्वतारोही आज तक कैलाश पर्वत पर नहीं पहुंच पाया।

मान्यता है कि इस पर्वत पर सूरज की रोशनी पड़ते ही मणि जैसा कुछ चमकता है, जो सिर्फ भाग्यशाली लोगों को ही दिखता है।

जिसने भी इस पर्वत पर चढ़ने की हिम्मत की वह पत्थर में बदल गया

कहा जाता है कि एक बार एक गद्दी (चरवाहे) ने अपनी भेड़ों के झुण्ड के साथ कैलाश पर्वत पर चढ़ने की कोशिश की। लेकिन वह सफल नहीं हो पाया और श्रापित हो गया।

भगवन शिव ने उसे और उसके झुण्ड को पत्थर में तब्दील कर दिया।

लोगों के बीच ऐसी मान्यता है कि कैलाश पर्वत की प्रमुख चोटी के नीचे छोटे चोटियों की श्रृंखला श्रापित चरवाहे और उसकी भेड़ों के अवशेष हैं।

एक और लोक कथा के मुताबिक एक बार एक साँप ने भी इस चोटी पर चढ़ने का प्रयास किया लेकिन असफल रहा। सांप भी पत्थर में तब्दील हो गया।

 

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